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Wednesday, March 4, 2020

जोसेफ़ स्टालिन: कुछ इस तरह हुआ था सोवियत तानाशाह का अंत

21 दिसंबर, 1952 को अपने जन्मदिन पर स्टालिन ने अपने 'बिलज़नाया' डाचा में एक बर्थडे पार्टी दी थी जिसमें उनके तमाम क़रीबी लोग आमंत्रित थे.

ग्रामोफ़ोन पर लोकसंगीत और डाँस के गाने चल रहे थे. डिस्क का चयन खुद स्टालिन अपनी देखरेख में करवा रहे थे. वहाँ कम से कम दो मेहमान ऐसे थे जिन्हें ये सब रास नहीं आ रहा था.

उनमें से एक थे निकिता ख्रुश्चेव जिन्हें नाचने से नफ़रत थी. उन्हें छेड़ने के लिए स्टालिन ने उनसे यूक्रेन का 'गोपाक' डाँस करने के लिए कहा. स्टालिन खुद कभी डाँस के 'स्टेप्स' पर महारथ नहीं हासिल कर पाए, इसलिए उन्हें दूसरों से डाँस करवा कर उसे परेशान करने में बहुत मज़ा आता था, ख़ासकर दूसरा जब डाँस में अनाड़ी हो.

दूसरी महिला जिसे वो शाम बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी, वो थीं स्टालिन की बेटी स्वेतलाना अलिलुएवा.

उस समय वो 26 साल की थीं, लेकिन तब तक उनका दो बार तलाक हो चुका था. स्वेतलाना को ये कतई बर्दाश्त नहीं था कि कोई उसे कुछ करने का हुक्म दे.

जब स्टालिन ने उसके साथ डाँस करने की इच्छा जताई तो उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया.

स्टालिन इस इंकार को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्हें ग़ुस्सा आ गया.

उन्होंने अपनी बेटी के बाल पकड़े और उसे लगभग खींचते हुए आगे ले आए. स्वेतलाना का चेहरा इस अपमान से लाल हो गया और उनकी आँखों से आँसू निकल आए.

निकिता ख्रुश्चेव अपनी आत्मकथा, 'ख्रुश्चेव रिबेंबर्स' में लिखते हैं, 'स्टालिन ने इतना पाशविक व्यवहार इसलिए नहीं किया था कि वो स्वेतलाना को कोई तकलीफ़ पहुंचाना चाहते थे. असल में ये उनका स्वेतलाना के लिए स्नेह दिखाने का तरीका था. लेकिन दूसरों को लग रहा था कि वो उनके साथ ज़्यादती कर रहे थे. लेकिन स्टालिन अक्सर इस तरह की हरकतें करते रहते थे.'

दो महीने बाद 28 फ़रवरी को स्टालिन ने अपने डाचा पर अपने चार वरिष्ठ सहयोगियों जॉर्जी मेलेनकोव, बेरिया, ख्रुश्चेव और बुल्गानिन को एक फ़िल्म देखने के लिए बुलाया.

फ़िल्म देखने के बाद सबके लिए बहुत अच्छा खाना और शराब परोसी गई.

पार्टी प्रेसीडियम के सदस्यों ने जानबूझ कर कोई ऐसी बात नहीं की जो स्टालिन को नागवार गुज़रे. पार्टी 1 मार्च को सुबह 4 बजे समाप्त हुई.

किसी को ज़रा भी आभास नहीं मिला कि स्टालिन की तबियत नासाज़ है.

बाद में ख्रुश्चेव ने लिखा कि 'हम सभी स्टालिन को भला-चंगा छोड़ कर आए थे. वो हमसे मज़ाक कर रहे थे और बार बार मेरे पेट में अपनी उंगलियाँ घुसा रहे थे. वो जानबूझ कर यूक्रेनियन लहजे में मुझे 'मिकिता' कह कर पुकार रहे थे.'

स्टालिन ने अपने अंगरक्षकों को निर्देश दिए कि अब वो सोने जा रहे हैं.

उनके एक अंगरक्षक पावेल लोज़गाचेव ने उनके जीवनीकार एडवर्ड रादज़िंस्की को बताया कि 'स्टालिन ने हमसे कहा कि कोई उनके कमरे में तब तक ना आए, जब तक वो उन्हें ख़ुद न बुलाएं.'

स्टालिन के एक और जीवनीकार रॉबर्ट सर्विस लिखते हैं, '1 मार्च को पूरे दिन स्टालिन के कमरे से कोई आवाज़ नहीं आई. वहाँ हर अंगरक्षक की 'शिफ़्ट' दो घंटे की हुआ करती थी. इसके बाद वो दो घंटे आराम करता था और फिर शिफ़्ट पर आ जाता ता. ऐसा इसलिए किया जाता था कि गार्ड हमेशा मुस्तैद रहें और उनमें सुस्ती ना आए.'

स्टालिन की आदत थी कि जब वो सुबह सो कर उठते थे तो वो नींबू की फाँक के साथ चाय का एक कप माँगते थे.

उनके एक अंगरक्षक मार्शल एलेक्ज़ेडर योगोरोव ने बाद में बताया कि हम सब लोग थोड़े परेशान हो गए क्योंकि पूरे दिन स्टालिन ने चाय का कप नहीं माँगा.

कुछ लोगों ने समझा कि वो चाय इसलिए नहीं माँग रहे हैं, क्योंकि उन्होंने थर्मस में रखी चाय पी ली है.

शाम साढ़े छह बजे डाचा की लाइट्स ऑन कर दी गईं लेकिन स्टालिन तब भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकले.

उन्होंने ना तो खाना मंगवाया और ना ही कुछ करने का आदेश दिया.

रात 10 बजे मास्को से सेंट्रल कमेटी के दफ़्तर से स्टालिन के लिए एक पैकेट आया. गार्डों ने आपस में विचार विमर्श करने करने के बाद तय किया कि पावेल लोज़गाचेव उस पैकेट के साथ स्टालिन के शयन कक्ष में जाएंगे.

जब पावेल शयनकक्ष में घुसे तो वहाँ का दृश्य देख कर भौचक्के रह गए.